वफादार दोस्त। Vafadar Dost। Friendship Story in Hindi

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पुराने वक्त की बात है एक गांव में एक सेठ रहा करता था।

उसके पास कोई भी नौकर ज्यादा देर तक नहीं रुक पाते था। उसकी बड़ी वजह यह थी कि उसके पास कोई भी आता तो सेठ उसे काम देने से पहले तीन शर्ते रख देता लेकिन कोई भी नौकर उन तीन शर्तो पर काम को तैयार नहीं होता।

एक दिन सेठ के पास राम नाम का एक आदमी काम के लिए आया ” सेठ बड़ी दूर से आया हूं कुछ काम मिल सकता है “

सेठ मुस्कराते हुए बोला ” क्या काम कर सकते हो कर घर संभाल सकते हो या दुकान पर काम कर सकते हो। “

” जी सेठ मै ये सारे काम कर सकता हूं बस आप मुझे यह नौकरी दे दीजिए ” राम कहता हैं।

” नौकरी पर तो मैं तुम्हें रख लूंगा बस तुम्हें मेरी तीन शर्त माननी होगी “ सेठ कहता।

” कौनसी 3 शर्ते सेठ जी ? “ रामू ने सवाल किया।

” मेरी पहली शर्त यह है कि मैं तुमसे कभी भी और कोई भी काम किसी भी वक्त करा सकता हूं ” सेठ ने पहली शर्ट रखी।

” दूसरी शादी है कि तुम्हें दिन में एक समय का खाना मिलेगा “ सेठ की दूसरी शर्त।

” और मेरी तीसरी शर्त अगर तुम खुद नौकरी छोड़ने को बोलोगे तो तुम्हें मुझे पूरे साल की तनख्वाह देनी होगी “ सेठ की तीसरी शर्त।

रामू की मजबूरी थी इसलिए बगैर सोचे समझे उसने हां कर दी।

सेठ को तो ऐसे ही लोगों की तलाश रहती थी जिन से काम निकाला जा सके सेठ रामू से खूब काम करवाता और बदले में सिर्फ एक वक्त की रोटी देता।

राम दिन-ब-दिन कमजोर हो रहा था लेकिन उसकी मजबूरी थी अगर वह खुद नौकरी छोड़ने के लिए बोलता तो उसे सेठ को सारी शर्तें माननी पड़ती।

एक दिन सेठ की बीवी रामू के लिए खाना लेकर आती है तो रामू कहता है ” इतना काम करने के बाद एक रोटी से पेट नहीं भरता। “

इतने में सेठ बोलता है ” क्यों भाई रामू इतना कौन सा काम कर दिया तुमने की एक रोटी से पेट नहीं भरता तुम्हारा “ इतना बोल कर सेठ रामू को गिरा देता है और बोलता है ” यहां पर काम करना है तो ऐसा ही खाना मिलेगा तुम्हें “

रामू कुछ दिन तो बिना बोले काम करता रहता है लेकिन अब वह हिम्मत हार चुका था। वो तुरंत सेठ के पास गया और बोला ” मैं अब काम नहीं कर सकता “

यह सुन सेठ गुस्से से कहता है ” तो ठीक है मेरी शर्त याद है ना वह पूरी करो और जाओ यहां से। “

राम को सेठ की तीन शर्तें माननी पड़ती। उसने अपनी मां के जेवर बेचकर सेठ को पैसे दे दिए और अपने गांव वापस लौट गया।

अपने गांव पहुंच कर एक दिन वह नदी के किनारे बैठा था। उसका एक दोस्त कर्मू उसके पास आया और पूछा ” रामू तू शहर से कब आया। बताया भी नहीं ? “

कर्मू के बार बार पूछने पर रामू ने सारी बात कर्मू को बताई। उस सेठ पर बहुत गुस्सा आया और बोला ” मेरे दोस्त मुझे सेठ का पता दे और कुछ दिन बाद मुझे यही मिलना। “

कर्मू सेठ से मिलने पहुंच गया सेठ के पास पहुंचकर बोला ” सेठ जी कोई काम मिलेगी बहुत परेशान नहीं मैं हूं “

सेठ ने वही तीन शर्ते कर्मू के सामने रख दी।

सेठ की तीनों शर्ते सुनने के बाद कर्मू ने कहा ” सेठ जी मै आपके तीनों शर्त मानने के लिए तैयार हूं लेकिन आपको मेरी एक शर्त माननी होगी। “

सेठ के पास ऐसा कोई काम करने वाला नहीं आया था। सेठ ने कहा ” तुम्हारी शर्त क्या है बोलो ? “

कर्मू बोलता ” सेठ जी अगर मैं काम छोड़ कर जाऊं तो मुझे आपको पूरे साल की तनख्वाह देनी होगी, यह तो हुई आपकी शर्त और मेरी शर्त ये की अगर आप खुद मुझे नौकरी से निकाले तो आपको मुझे एक साल की तनख्वाह देनी होगी। “

फिर सेठ ने सोचा ” ऐसा मौका तो कभी आएगा ही नहीं मेरे पास नौकरी करना इतना आसान तो है नहीं ” और कहां ” ठीक है, मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है। “

कर्मू अपने काम में लग गया और जैसा सेठ कहता वैसा करने लगा। एक दिन सेठ ने कहा ” दुकान से अनाज की बोरियां निकालना और जरा ध्यान से ताले लगाकर आना “

कर्मू जानबूझकर ताला खुला छोड़ कर आ गया और सोचा ” यह अच्छा मौका है कंजूस सेठ को मजा चखाने का “

रात को चोर सारा अनाज लेकर भाग गए। सुबह जब सेठ दुकान पर गया तो दुकान खाली थी उसने कर्मू से पूछा ” तुमने ताला नहीं लगाया था क्या ? सारा अनाज चोर ले गए। “

कर्मू ” सेठ जी मैंने तो ताला अच्छे से लगाया था लगता है चोर ताला तोड़कर अनाज ले गए “

सेठ को दुखी देखकर कर्मू खुश होता है। एक दिन सेठ की बीवी ने कर्मू को बोला ” जाओ जरा बाजार से लकड़ियां लेकर आओ “

कर्मों लकड़ियां लेकर आया और बोला ” इन्हे कहा रखो सेठानी “ सेठानी ने भी बड़े ताव से कहा ” कहां रखेगा मेरे सर पर रख दे “

कर्मू ने भी वही किया उसने लकड़ियां सेठानी के सर पर रख दी।

इतने में सेठ गुस्से में बोला ” यह क्या कर दिया तुमने मैं तुम्हें अभी नौकरी से निकालता हूं अभी निकल जाओ “

कर्मू ने कहा ” सोच लो सेठ मेरी शर्त याद है ना “

सेठ ने बड़े गुस्से में कहा ” तू यहां से निकल तुम्हारी शर्त पूरी करता हूं बस निकल जा यहां से “

शर्त के मुताबिक जैसे ही सेठ ने पैसे कर्मू को दिए कर्मू बोला ” सेठ जी मैं आपकी तरह गिरा हुआ इंसान नहीं, मैं तो बस आपको आपकी गलती का एहसास दिलाने यहां नौकर बन कर आया था। मुझे तो बस अपने दोस्त का बदला लेना था और मैंने ले लिया अब बस मुझे मेरे दोस्त की तंखुआ दे दीजिए जिसपे उसका हक है मै यहां से चला जाऊंगा। “

सेठ बोला ” यह लो तुम्हारे दोस्त की तनख्वाह “

कर्मू खुशी-खुशी वहां से चला गया और रामू के पास जाकर सारी बात बताई और उसे उसके हक से पैसे लौटा दिए।

रामू ने कर्मू को गले लगा लिया।

सीख:- हमें अपने दोस्तों का ख्याल रखना चाहिए और हमें अपने दोस्तों का साथ देना चाहिए अच्छे दोस्त की पहचान मुसीबत के वक्त होती है।

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About Devashish Markam

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