पद्मावत की कहानी। Padmavat in Hindi

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बचपन का समय बहुत ही मह्त्वपूर्ण मना जाता है।

हमारे माता पिता हमें राजा और रानियां के कारनामे सुनाया करते थे और हमें भी उनकी तरह बनने को कहा करते।

हमने कई राजा, रानियां की कहानी सुनी होगी पर रानी पद्मावती की कहानी बेहद अलग है। आइए जानते है रानी पद्वति के बारे में…

Story of Padmavat in hindi

रानी पद्मावती 13 – 14 सदी कि भारतीय रानी थी।

रानी पद्मावती को रानी पद्मिनी के नाम से जाना जाता था।

रानी पद्मावती काफी सुंदर थी। इतिहास की किताबो में रानी पद्मावती की सुंदरता के साथ साथ शौर्य और बलिदान की प्रस्तुत वर्णन मिलता है।

इतिहास में पद्मावती के रूप, यौवन और जोहार की कथा मध्य काल से लेकर वर्तमान काल तक कवियों, धर्म प्रचारकों और लोक गायकों द्वारा विविध रूपो में व्यक्त हुई है।

रानी पद्मावती का जन्म सिंघल द्वीप में हुआ। सिंघल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की बेटी थी रानी पद्मिनी।

रानी पद्मावती के पास हीरामन नाम का एक तोता था। हीरामन रानी पद्मावती को बेहद प्यारा था।

रानी पद्मावती के बड़े होते ही, पद्मावती के पिता राजा गंधर्व सेन ने उनकी विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन करवाया जिसमें हिंदुस्तान के सभी राजा, राजपूतों को नियोता भेजा गया।

मलकान सिंह, एक छोटे राज्य के राजा। उन्होंने सबसे पहले विवाह के लिए रानी पद्मावती का हाथ मंगा।

स्वयंवर में चितौड़ के राजा रतन सिंह भी शामिल थे। उनकी पहले से 13 रानी थी।

राजा रतन सिंह ने मालकिन सिंह को स्वयंवर में हरा कर रानी पद्मावती से विवाह कर लिया और उन्हें अपने साथ चितौड़ ले आए।

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Chittorgarh, Rajasthan

राजा रतन सिंह बहुत अच्छे शासक थे, जो अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे। इसके अलावा राजा को कला का बहुत शौक था।

देश के सभी कलाकारों, नृत्यकियो, कारीगरों, संगीतकार, कवि, गायक आदि का राजा स्वागत करते और उन्हें सम्मानित किया जाता था।

राजा रतन सिंह के राज्य में एक बहुत अच्छा गायक राघव चेतक था। लेकिन गायकी के अलावा राघव को काला जादू भी आता था और ये बात राज्य में किसी को भी पता नहीं था।

राघव ने काले जादू का इस्तेमाल अपने ही राजा के खिलाफ करना चाहा, और वह एक दिन रंगे हाथों पकड़ा भी गया।

राजा को जब ये बात पता चली, तब उसने सजा के रूप में उसका मुंह काला कर उसे गंधे में बिठाकर अपने राज्य से बहिष्कृत कर दिया।

राजा रतन सिंह की सजा के बाद राघव चेतक ने राजा से बदला लेने की ठान ली और राघव दिल्ली की ओर बढ़ा, ताकि वो दिल्ली के सुल्तान से हाथ मिला कर चितौड़ में हमला करवा सकें।

राघव चेतक अलाउद्दीन खिलजी के बारे में जानता था। उसे पता था सुल्तान दिल्ली के पास जंगल में रोज शिकार के लिए आता है।

राघव किसी भी तरह अलाउद्दीन खिलजी से मिलना चाहता था इसलिए राघव रोज दिल्ली के जंगल में जा कर बासुरी बजाय करता था।

राघव की सब्र एक दिन रंग लाई।

राघव ने अलाउद्दीन खिलजी को जंगल की ओर प्रवेश करते देख। अलाउद्दीन खिलजी को देख राघव झट से बसुरी बजाना शुरू कर दिया।

इतनी सुंदर बांसुरी की आवाज जब अलाउद्दीन खिलजी और उसके सैनिको के कानों में पड़ी तो सब आश्चर्यचकित हो गए। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सैनिकों को उस इन्सान को ढूढने के लिए भेजा, राघव को सैनिक ले आये।

अलाउद्दीन खिलजी ने राघव को अपने दरबार में आने का न्योता दिया और अपनी संगीत का प्रदर्शन देने को कहा।

राघव ने इस मौके का चालाकी से फायदा उठाते हुए सुल्तान से कहा ” जब उसके पास इतनी सुंदर सुंदर वस्तुएं है, तो वो क्यूँ इस साधारण से संगीतकार को अपने राज्य में बुला रहा है। “

अलाउद्दीन ये सुन सोच में पड़ गए और राघव से अपनी बात को विस्तार मे समझने को कहा।

राघव ने रानी पद्मावती के बारे में बताते हुए उनकी सुंदरता की इस तरह तारीफ करने लगा कि अलाउद्दीन खिलजी उसकी बात सुन कर ही उत्तेजना से भर जाते है और चितौड़ में हमले का विचार कर लेते है।

राघव की बातें सुन कर अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ चितौड़ की तरफ बढ़ने लगता है।

चितौड़ पहुंच कर वहा की सुरक्षा देख सुल्तान निराश हो जाता है। पर सुल्तान रानी पद्मावती से किसी भी तरह मिलना चाहते थे।

अलाउद्दीन ने एक खत राजा रतन सिंह को लिखा जिसमें उसने कहा कि वो रानी पद्मावती को बहन समझ कर मिलना चाहते है।

किसी औरत से मिलना चाहना, उस वक़्त ये किसी भी राजपूत ने लिए शर्म की बात थी। और रानी को बिना पर्दे के किसी से भी मिलने नहीं दिया जाता था।

अलाउद्दीन खिलजी बहुत ताकतवर शाशक था जिसके सामने किसी को भी मना करने की हिम्मत नहीं थी।

राजा रतन, अलाउद्दीन खिलजी को मना भी नहीं कर सकते थे। ऐसा कदम उठाना उनके और उनके राज्य के लिए खतरा हो सकता था। ये बात ध्यान में रखते हुए राजा रतन ने भी एक शर्त रख दी।

राजा रतन, अलाउद्दीन खिलजी को रानी से मिलने की इजाजत पर उनकी शर्त ये थी कि वो रानी को सीधे नहीं देख सकते बल्कि आइने में उनकी प्रतीबिम देख सकते है। अलाउद्दीन इस बात को मान जाते है।

अलाउद्दीन अपनी सबसे ताकतवर सेना के साथ किले में रानी से मिलने जाता है। अलाउद्दीन की सेना गुप्त रूप से देख रेख भी कर रहे होते है।

अलाउद्दीन, रानी की प्रतिबिम को देख कर मदहोश हो जाता है और रानी को अपने राज्य में ले जाना चाहते है।

अपने शिविर में लौटते समय, रतन सिंह उसके साथ आते है। अलाउद्दीन खिलजी इस मौके का फायदा उठा कर रतन सिंह को अगवा कर लेता है और वो पद्मावती एवं उनके राज्य से राजा के बदले रानी पद्मावती की मांग करते है।

गोरा और बादल ने अपने राजा को बचाने के लिए सुल्तान से युद्ध करने का फैसला किया। पद्मावती के साथ मिलकर दोनों सेनापति एक योजना बनाते है। योजना के तहत वे खिलजी को सन्देश भेजते है कि रानी पद्मावती उनके पास आने को तैयार है।

अगले दिन 150 पालकी, अलाउद्दीन खिलजी के शिविर की ओर चलना शुरू करते है।

अलाउद्दीन खिलजी के सभी सैनिक और रतन सिंह जब ये देखते है कि चितौड़ से पालकी आ रही है तो उन्हें लगता है कि वे अपने वे अपने साथ रानी पद्मावती को लेकर आये है।

ये देख राजा रतन सिंह को अपमानित होना पड़ा।

पालकी शिविर के पास रुकी। सबको आश्चर्य में पड़ गए, जब उन पालकियों से रानी या उनकी दासी नहीं बल्कि रतन सिंह की सेना के जवान निकले। रतन सिंह की सेना जल्दी से रतन सिंह को छुड़ा कर खिलजी के घोड़ों में चितौड़ की ओर भाग जाते है।

गोरा युद्ध में पराक्रम के साथ लड़ता है, लेकिन शहीद हो जाता है, जबकि बादल राजा को सही सलामत किले में वापस लाने में सफल होता है।

अपनी हार के बाद खिलजी क्रोध में आ जाता है और अपनी सेना से चित्तोर की ओर हमला करने को कहता है। अलाउद्दीन खिलजी की सेना रतन सिंह के किले को तोड़ने की बहुत कोशिश करती है, लेकिन वो सफल नहीं हो पाती।

जिसके बाद अलाउद्दीन अपनी सेना को किले को घेर कर रखने को कहता।

चितौड़ की घेराबंदी के लिए एक बड़ी और ताकतवर सेना को खड़ा किया गया ताकि राज्य के अंदर किसी भी खाने पीने का सामान राज्य में ना जा पाए।

लगातार कई दिनों तक खिलजी की सेना चितौड़ की घेराबंदी किये खड़े रहे, जिससे धीरे धीरे किले के अंदर खाने पीने की कमी होने लगी। अंत में रतन सिंह ने अपनी सेना को आदेश दिया कि किले का दरवाजा खोल दिया जाए और दुश्मनों से मरते दम तक लड़ाई की जाये।

रतन सिंह के इस फैसले के बाद रानी हताश होती है, उसे लगता है कि खिलजी की विशाल सेना के सामने उसके राजा की हार हो जाएगी, और उसे विजयी सेना खिलजी के साथ जाना पड़ेगा।

इसलिए पद्मावती निश्चय करती है कि वो जौहर कर लेगी। रानी पद्माती जोहार करने से पहले रतन सिंह से कहती है कि अगर राजा रतन सिंह युद्ध के मैदान से लौट ना पाए तो वो जोहार कर लेंगी।

राजा रतन सिंह, रानी पद्मावती के जोहार के लिए मान जाते है और युद्ध के मैदान की ओर बढ़ते है।

खिलजी अपनी सबसे ताकतवर सेना के साथ चितौड़ राज्य पर हमला कर देता है। राजा रतन सिंह की सेना, खिलजी की सेना के सामने टीक नहीं पाते पर अपनी शान और रानी को बचाने के लिए अपनी आखिरी सास तक लड़ते है।

राजा रतन सिंह की मृत्यु की खबर सुनने के बाद रानी पद्मावती जोहार के लिए तैयार हो जाती है। राज्य की सारी रानी और राज्य की सारी महिला, रानी पद्मावती के साथ जोहार करने में साथ देती है और आग में कूद कर अपने पतिव्रता होने का प्रमाण देती है। इस तरह रानी पद्माती की 1303 में मृत्यु हो जाती है।

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किले की महिलाओं के मरने के बाद, वहां के पुरुषों के पास लड़ने की वजह नहीं होती है। उनके पास दो रास्ते होते है या वे दुश्मनों के सामने हार मान लें, या मरते दम तक लड़ते रहें।

अलाउद्दीन खिलजी की जीत हो जाती है, वो चितौड़ के किले में प्रवेश करता है, लेकिन उसे वहां सिर्फ मृत शरीर, राख और हड्डियाँ मिलती है।

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About Devashish Markam

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