लालची वॉचमैन। Laalchi Watchman। Short Moral Story in Hindi

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एक शहर में एक आलीशान महल ताज महल के मालिक का नाम सक्सेना था।

सक्सेना मनोहर नाम के वॉचमैन को काम पर रखा हुआ था।

सक्सेना अपने काम के लिए शहर के बाहर उसका आना जाना लगा रहता था वह अपने विला में कुछ ही दिनों के लिए रहा करता था।

सक्सेना बहुत ही शरीफ और नेक दिल इंसान था। वॉचमैन की सेवा देख सक्सेना भी उससे बहुत खुश था।

सक्सेना की आलीशान बंगलों में तरह-तरह की महंगी पेंटिंग्स और मूर्तियां रखी हुई थी। मनोहर रोज बंगलो में जाता और बंगलो की साफ सफाई करता था।

एक दिन जब सक्सेना किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर के बाहर जाता है तब मनोहर उस बंगलों को भाड़े में दे देता है।

ऐसा पहली बार नहीं था कि मनोहर ने बंगलो को भाड़े में दिया हो, मनोहर ऐसा पहले भी कई बार कर चुका था। यह मनोहर की ऊपर की कमाई थी और इस बात का सक्सेना को बिल्कुल भी पता नहीं था।

समय बीतता गया और मनोहर सक्सेना के बंगलों को भाड़े में देखकर और पैसे कमाने लगा और उस विला को भाड़े में लेने की मांग भी बढ़ गई।

एक दिन उस बंगलो को बाड़े में लेने के लिए शर्मा नाम का एक आदमी आता है।

शर्मा जी:- वॉचमैन जी आप यह बंगला भाड़े पर देते हैं।

वॉचमैन:- जी हां

शर्मा जी:- मेरी बेटी की शादी है मुझे यह बंगलो तीन दिन के लिए भाड़े में चाहिए मेरे मेहमानों को रहने के लिए। एक दिन का कितना भाड़ा है।

तीन दिन का सुनकर मनोहर खुश हो जाता है।

वॉचमैन:- वैसे तो 1 दिन का 10000 है लेकिन आप एक साथ 3 दिन रहेंगे तो कुल मिलाकर 25000।

शर्मा जी:- ठीक है अब इतने आलीशान बंगले का इतना तो देना ही पड़ेगा।

शर्मा जी मनोहर को 15000 एडवांस में देखकर बाकी बाद में देने का वादा करते हैं।

मनोहर इतने सारे पैसे देकर उसकी तो चांदी हो जाती है।

कुछ दिन बाद मिस्टर शर्मा वापस लौटे और उन्होंने मनोहर को बचे हुए 10,000 भी दे दिए। मिस्टर शर्मा के साथ उनके कुछ मेहमान भी आए हुए थे।

मनोहर दे गेस्ट को बंगलो दिखाया और उन्हें वहां की कीमती चीजों का ध्यान रखने को कहा। वह गेस्ट उस बंगले में 3 दिन रहे।

उस बंगलों में रोज रात कोई ना कोई फंक्शन हुआ करता था। तीन दिन बाद एक-एक कर सारे गेस्ट चले गए।

मनोहर को खुश था क्योंकि उसे ढेर सारे पैसे मिले थे। हमेशा की तरह मनोहर बंगलो की साफ सफाई करने जाता है।

मनोहर जैसे ही बंगलो के अंदर गया उसने देखा कि उस बंगलो की सारी कीमती सामान गायब है। वह घबरा गया और रोने लगा मनोहर मनन ही मनन सोचने लगा ” यह क्या वह पेंटिंग कहां थे और वह सोने की मूर्ति सबका सब गायब साहब यह सब फोन से लाए थे अब मैं क्या करूंगा। पुलिस कंप्लेंट करूंगा तो साहब को सब पता चल जाएगा यह मैंने क्या कर दिया “

मनोहर अपने ही लालच में फस गया।

सीख:- हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए।

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About Devashish Markam

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