खिलौने वाले की सफलता। Khilone Wale ki Safalta Story in Hindi

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रामपुर गांव में एक खिलौने वाला रहता था। जो लकड़ियों से खिलौने बना कर बेचा करता था।

उसकी एक चोटी सी बेटी थी उसका नाम लीला था। लीला बड़ी ही होनहार थी। वो हमेशा अपने पिता के पास बैठ कर उनका काम देखा करती थी और कभी कभी खिलौने बनाने में मदद भी कर दिया करती थी।

लीला को खिलौने बनाने मै बड़ा मजा आता था।

एक दिन रोज की तरह लीला अपने पिता के साथ काम कर रही होती है और उनकी मदद कर रही होती है।

लीला:- पिताजी देखिए मैंने इस घोड़े में रंग भर दिए है।

पिता:- ये क्या नीला घोड़ा।

लीला:- हा ये जादुई घोड़ा है हम इसके लिए पंख भी बनाएंगे और उन्हें सोने का रंग डालेंगे।

पिता:- बड़ी ही सुन्दर कल्पना है। मै अभी इसके पंख बना देता हूं।

माता:– लीला कभी मुझे भी घर के कामों पर मदद करो तो जानूं। दिन भर अपने बाबा के साथ रहती हो।

पिता:- घर के काम काज तो रोज की बात है। पहले कुछ हुनर सीख लेगी तो आगे इसके काम आयेगा।

माता:- ठीक है, करो अपनी मनमानी।

ऐसे ही कुछ साल बीत जाते है। लीला अब बड़ी हो गई थी लीला के पिता ने बड़े ही धूम धाम से लीला की शादी मदन नाम के एक लड़के से करवा दी।

विदाई के समय लीला के पिता लीला के हाथो में सुनहरे पंखों वाला घोड़ा देकर कहते है।

पिता:- बेटी अपने इस हुनर को कभी नहीं भूलना।

कुछ साल बीत गए मदन और लीला का विवाह सफल रहा।

मदन एक बड़ी सी फैक्ट्री में काम किया करता था उन दोनों को एक बेटी हुई थी जिसका नाम मदन ने बड़े ही प्यार से शर्मीली रखा।

उनके घर में खुशियां ही खुशियां थी। पर एक दिन मदन जिस बस में फैक्ट्री से घर लौट रहा था वह बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई।

मदन उस हादसे से बच तो गया पर उसने अपने दोनो हाथ गवाने पड़े। अपने इस विकलांग से दुखी हो कर एक रात मदन घर छोड़ कर चला गया।

लीला पर जैसे आसमान टूट पड़ा घर की पूरी जिम्मेदारी लीला के कंधो पर आ पड़ी उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वो करे क्या ?

लीला:- हे ईश्वर मै क्या करू कहा जाऊं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, मुझे रास्ता दिखाओ।

लीला देखती है कि उसकी बेट उसी घोड़े के साथ खेल रही होती है जो लीला को उसके पिताजी ने दिया था।

लीला को अपने पिताजी की कहीं हुई बात याद आने लगी जो उसके पिता ने विदाई के समय कहीं थी।

शर्मीली:- क्या हुआ मा ? क्या सच में ये घोड़ा जादुई है ?

लीला:- हा बेटा, ये घोड़ा जादुई है, ये तुम्हारी हर बात सुनेगा।

उस दिन से लीला ने तय किया कि वो अपने हुनर का इस्तेमाल करेगी। वो खिलौने बनाएगी और उन्हें बेच कर अपना घर चलाएगी और बेटी की शिक्षा पूरी करेगी।

ये सिलसिला ऐसा ही चलता रहा लीला खिलौने बनाती और उन्हें बाजार ले कर बेचती।

कुछ समय बाद लीला के खिलौनों की मांग बढ़ती ही जा रही थी और ज्यादा मुनाफा होने की वजह से को खुद के खिलौने का एक छोटा सा दुकान भी शुरू कर देती है।

लीला, महिलाओं का एक समूह बना कर एक छोटा सा कारखाना भी शुरू कर देती है।

लीला की सफलता की कहानी बड़े बड़े न्यूज चैनल और समाचार में भी छपते रहते है।

ऐसे ही एक समाचार में मदन लीला की तस्वीर देखता है।

समाचार पत्र ने लिखी कहानी पढ़ कर मदन को अपनी गलती का एहसास होता है। मदन अपने घर लौट जाता है और लीला से माफी मांगता है।

मदन:- मुझे माफ़ कर दो लीला, मै तुम पर बोझ नहीं बनना चाहता था।

लीला:- मुझे खुशी है कि आप वापिस आ गए।

मदन:- मगर तुमने ये सब किया कैसे ?

शर्मीली:- ये सब इस जादुई घोड़े का कमाल है ना मा।

लीला:- हा जादुई घोड़े का कमाल है, बचपन में मेरे पिताजी ने मुझे खिलौने बनाने की हुनर सिखाया था और उन्होंने ही मुझे ये घोड़ा बना कर दिया था। बस मेरा वो हुनर काम आ गया।

शर्मीली:- देखा पिताजी, है ना ये जादुई घोड़ा।

शिक्षा:- अपने हुनर का अगर हम सही इस्तेमाल करे तो हम मुश्किल से मुश्किल स्तिथि भी पलट सकते है।

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About Devashish Markam

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