डरपोक पत्थर। Darpok Pathar। Motivational Kids Story in Hindi

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एक बार एक गांव में मोहन नाम का एक मूर्तिकार रहा करता था।

मोहन बहुत ही सुंदर मूर्तियां बनाया करता था।

आसपास के सभी गांव के लोग मोहन की पास मूर्तियां बनवाने के लिए आया करते थे।

एक दिन मोहन अपने घर के बाहर मूर्तियां बनाने का काम कर रहा था तभी वहां गांव के कुछ लोग आते हैं।

उनमें से एक आदमी ” कैसा हो, सुनो भाई हमें अपने गांव में एक गणेश जी की एक मूर्ति स्थापन करनी है और उसके लिए गणेश जी की एक सुंदर मूर्ति चाहिए। “

मोहन कहता है ” हां हां क्यों नहीं, लेकिन मुझे गणेश जी की मूर्ति के लिए कम से कम एक हफ्ता लगेगा। “

आदमी कहता है ” एक हफ्ता क्या 10 दिन ले लो लेकिन मूर्ति एकदम सुंदर बैनी चाहिए। “

मोहन कहता है ” हां जरूर आप चिंता ना करें मैं ऐसी मूर्ति बनाऊंगा की सारी गांव वाले देखते ही रह जाएंगे। “

गांव के लोगो ने कहा ” ठीक है मोहन हम एक हफ्ते बाद आएंगे मूर्ति लेने। “

मोहन अपने घर के पीछे जाता है जहां उसने मूर्ति बनाने के लिए बहुत सारे पत्थर इकट्ठा करके रखे थे। मूर्ति बनाने के लिए उनमें से दो मजबूत पत्थर चुनता है।

मोहन पत्थर लेकर वह अपने घर के सामने आता है, जहां वह मूर्तियां बनाता था।

पत्थर तोड़ने के लिए वह छीनी और हथोड़ा लेकर आता है जैसे ही वह पत्थर तोड़ने वाला होता है तभी अचानक पत्थर में से आवाज आने लगती है।

पत्थर जोर जोर से चीखते हुए बोला ” मुझे मत मारो “

मोहन इधर-उधर देखने लगता है पर उसे कोई दिखाई नहीं देता वह फिर से पत्थर तोड़ने लगता है

पत्थर दुबारा चिक्ते हुए कहता है नहीं नहीं मुझे मत मारो मुझे इस हथौड़े से डर लगता है और मैं यह हथौड़ी के घाव नहीं सह सकता। “

मोहन मनन है मनन सोचने लगा ” ये पत्थर तो काफी डरपोक निकला यह मेरे किसी काम का नहीं। “

मोहन उस पत्थर बाजू में रख देता है और दूसरा पत्थर लेकर अपना काम शुरू कर देता है मोहन दूसरे पत्थर वह भी तोड़ने लगता है पर वह चुपचाप अपने घाव सह लेता है।

अब बाजू में रखे पत्थर को मजे आने लगे और वो दूसरे पत्थर को छीनी और हथोड़े से मार खाता देख उसने कहा ” क्यों भाई मजा आ रहा है ना अगर दर्द हो रहा हो तो मूर्तिकार को बोल दो वह तुम्हें भी छोड़ देगा। “

वो बेचारा पत्थर कुछ नहीं बोलता और हथौड़े के घाव सहते जाता है और कुछ ही दिनों में मोहन उस पत्थर से एक सुंदर मूर्ति बनाता है।

कुछ दिनों बाद गांव के लोग मूर्ति लेने आते हैं।

उनमें से एक आदमी मोहन से कहता ” मोहन भाई क्या मूर्ति तैयार हो गई है। “

मोहन भी बड़े प्यार से कहता ” हां मूर्ति तो तैयार है। “

मूर्ति लेने आए गांव के लोग उस मूर्ति को देख कर वाहवाही देने लगे।

वहा खड़े गांव के लोग मोहन से कहने लगे ” अरे वाह बहुत ही सुंदर मूर्ति बनाई है आपने। “

गांव के लोगो को मूर्ति पसंद आ गई थी पर उन्हें एक और पत्थर की जरूरत थी उन्होंने मोहन से पूछा ” भाई हमें एक और पत्थर लगेगी नारियल फोड़ने के लिए क्या एक पत्थर भी मिल सकती है ? “

मोहन ने कहा ” हां जरूर यह लो मुझे अब इसकी कोई जरूरत नहीं। “

मोहन उस डरपोक पत्थर और गणेश जी की मूर्ति को गांव वालों को सौंप देता है।

लोग उस पत्थर और मूर्ति को लेकर मंदिर की ओर बढ़ते हैं।

कुछ देर बाद मंदिर में मूर्ति की स्थापना करते ही मंदिर के बाहर भक्तो की भीड़ जमा हो गई।

पत्थर यह क्या कर रहे हो मुझ पर नारे मत छोड़ो मुझे दर्द होता है

धीरे-धीरे गांव के सभी लोग मंदिर आने लगे गणेश जी की पूजा करने लगे और प्रसाद के तौर पर पेड़े और लड्डू चढ़ाने लगे और मोहन के पास से लाएं दूसरे पत्थर पर नारियल फोड़ने लगे।

गणेश जी की मूर्ति ने डरपोक पत्थर से पूछा ” क्यों भाई मजा आ रहा है ? “

डरपोक पत्थर उदास हो गया और उसने कहा ” मजे तो आपके हैं पेड़े मोदक खाने को मिल रहे हैं और सब आपके सामने हाथ जोड़ रहे हैं मेरा क्या मुझ पर नारियल फोड़ जा रहे हैं। “

गणेश जी की मूर्ति कहती है ” देखा उस दिन अगर थोड़ा घाव सह लेते तो मेरी जगह आज तुम होते। “

शिक्षा:- हमें बिना डरे मुसीबत का सामना करना चाहिए।

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About Devashish Markam

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